बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

कविता : बस्ता

" बस्ता "

मेरा बस्ता है सबसे सस्ता, 
धुलने पर सूंदर है दिखता | 
स्कूल से लेकर घर तक जाता,
हर पल हर दिन साथ निभाता |  
अच्छी खातिर करता हूँ, 
स्कूल में इसी के साथ पढ़ता हूँ | 
दो बद्धी , चार है चेन, 
न हो तो हो जाऊँ बेचैन | 
हल्का रखता बोझ न देता, 
जितना हो उतना ही भरता | 

नाम : प्रांजुल कुमार , कक्षा : 8th , अपनाघर 

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

कविता : हिमालय

" हिमालय "

देखो इस हिमालय को,
कुछ हमसे वह कहता है | 
तूफानों से लड़ता वह है,
फिर भी खड़ा रहता वह है | 
इंसानों को वह सिखाता है,
 अपने घमंड नहीं दिखाता है | 
नदियों का पहाड़ उठाता है,
फिर भी कुछ न कहता है | 
अपने इस व्यव्हार से वह,
 हमको भी कुछ सिखाता है | 

नाम : समीर कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 


कवि परिचय : यह हैं समीर कुमार जो की इलाहाबाद से कानपूर के अपनाघर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं | कविताओं के साथ साथ एक अच्छे संगीतकार हैं | खेल को भी बड़े मन लगाकर खेलते हैं | 

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

कविता : फूल

" फूल "

मौसम फूलों पर तो इन दिनों, 
बहार है ही सामेल कचनार जैसी | 
बड़े मेड़ भी फूलों से लद गए हैं,
ये सभी गहने से लद  गए हैं |  
इस प्यारे संसार में लोगों ने, 
अपनी - अपनी किस्मत बनाई | 
ये छोटे से पृथ्वी में लद गए,
खुशबुओं से इसको महका गए |  
खेतो में खिले सरसों अरहर जैसे, 
पीले -पीले रंगों में है जैसे | | 

नाम : राजकुमार , कक्षा : 8th , अपनाघर 


कवि परिचय : यह राज हैं जो की हमीरपुर के रहने वाले हैं कविताये बहुत अच्छी लिखते हैं | पढ़लिखकर एक डॉक्टर बनना चाहते हैं | हमेशा अपने पढ़ाई के प्रति कोशिश करते रहते हैं | 

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

कविता : " कल सोच "

 " कल  सोच "

कल का क्या सोचना, 
वो तो यूँ ही गुजर गया | 
तैयार रहना है हमें,   
जो आने वाला कल है |
कल शायद जिंदगी बदल जाए, 
और किसी की मिट जाए | 
किसने सोचा होगा उस कल का, 
क्या होगा उस दिन | 

नाम : नितीश कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 


कवि परिचय : यह हैं नितीश जो बिहार से हैं | कविताओं के साथ साथ टेक्नोलॉजी में बहुत मन लगता हैं | इनके कविताओं से बहुत प्रेरणा मिलती हैं | 

कविता : " जीना छोड़ दे "

"जीना छोड़ दे "

जिंदगी में दुःख है तो, 
हम सोचते हैं जीना छोड़ दे | 
जब  सभी दरवाज़े बंद हो, 
तब एक उम्मीद के सहारे जीते हैं | 
हम करते हैं इंतज़ार उस किरण का, 
जो हमारे लिए हुआ बना हो | 
काश हमारी जिंदगी भांग न हो, 
समाज में थोड़ा सम्मान हो | 
फूलों में से थोड़ी खुशियां, 
मेरे परिवार में भी हो | | 

नाम : देवराज कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 


कवि परिचय : यह हैं देवराज कुमार हैं जो की बिहार के नवादा जिले से कानपूर जिले में पढ़ने के लिए आये हैं | कवितायेँ बहुत अच्छी लिखा करते हैं | इसके साथ - साथ नृत्य भी बहुत अच्छा कर लेते हैं | 

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

कविता : मैं वो बहता हवा नहीं

" मैं वो बहता  हवा नहीं जो "

मैं वो बहता  हवा नहीं जो, 
मैं वो बहता  हवा नहीं जो, 
हिमालय से टकराकर मुड़ जाता हूँ |  
मैं वो ठण्डा मौसम नहीं, 
पल भर में बदल जाता हूँ |  
मैं तो वो बंदा हूँ जो, 
जिंदगी की राह में | 
लाखों सपने सजाता हूँ, 
क्या करू वो सपनों को | 
जिसको  मैंने सजाया है,
उन सपनों के वजह से ही | 
यहाँ तक मेहनत से आया हूँ,
निगाहें मेरी उन राहों पर | 
जो मेरी जिंदगी को सरल बनाया, 
आने वाले कल के दिन | 
खूब रौनक लायगा | |

नाम : देवराज कुमार , कक्षा : ७थ, अपनाघर  

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

कविता : रक्षाबंधन "

" रक्षाबंधन " 

रेशम का ये डोर बहना,
जो तूने बाँधी है बहना | 
हर एक एक कदम पर,
खुशियां तुमको है देना | 
मैं जमीन  पर रहकर भी, 
आसमां में उड़ाना सिखाऊंगा |  
हिम्मत से मैं तुम्हे , 
साथ चलना सिखाऊंगा |  
हर मुश्किलों में साथ, 
मेरा काम देना होगा | 
इस रेशम की डोर की,
 कीमत मैं चुकाऊंगा |  
हमेशा खुश तू रहना,
मुबारक हो रक्षाबंधन,
मेरी प्यारी बहना | | 

नाम : देवराज कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 

कविता : खेल

" खेल "

खेल क्या है, इसे जानो तुम,
खेलो और पहचानों तुम | 
कोई हारता है ,कोई जीतता है,
कभी भी खेल न घबराओ तुम |  
अपने लक्ष्य को कभी न भूलो तुम,
अपने लक्ष्य पर चलते जाओ तुम | 
खेलो के खेल में, कभी हरो तुम, 
सफलता तेरी हमेशा पग चूमेंगी |   
एक दिन सफल हो जाओगे तुम, 
हार के डर को खुशियों में बदलो तुम | 
खेल क्या है इसे जनों तुम | |  

नाम : नितीश कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 

शनिवार, 27 जनवरी 2018

कविता : दोस्ती का भी क्या कहना

" दोस्ती का भी क्या कहना "

ये दोस्ती का भी क्या कहना,
दोस्त बनाकर हमको है रहना | 
हर खतरों के मोड़ पर, 
साथ है हमको चलना | 
हर छोटी सी चीज को, 
मिल बांटकरहै खाना | 
ये दोस्ती का भी क्या कहना,
दोस्त बनाकर हमको है रहना |   
नाम : कुलदीप कुमार , कक्षा : 6th , अपनाघर



कवि परिचय : यह हैं कुलदीप कुमार जो की छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं और अपनाघर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं | खेल कूद में भी बहुत रूचि रखते हैं | हमेशा कुछ करने के लिए एक्टिव रहते हैं |  

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

कविता : सुबह की वह पहली किरण

" सुबह की वह पहली किरण "

सुबह की वह पहली किरण,
लगता है नया सवेरा लाएगी | 
आयी मंडराती हुई आस पास,
जब मैं बैठा खिड़की के पास | 
वह मुझे एक बात समझा गई,
वह बात मुझको समझ में आई | 
याद के सहारे जिया जा सकता है,
हर सुख दुःख को सहा जा सकता है | 
अमावस्य के रात के अँधेरे में भी,
उजयाले के आस लगाए बैठा था | 
की जुगनू जैसा चमकता हुआ 
आएगी एक उम्मीद की किरण | 
सुबह की वह पहली  किरण 
सोच सोचकर सहम गया,
बीतों  दिनों  को देखकर वहम गया | 
हर असंभव को संभव, 
हर नामुनकिन को मुनकिन 
बनाया जा सकता है | 
सुबह की वह पहली किरण,
लगता है नया सवेरा लाएगी | 

नाम : अखिलेश कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 


कवि परिचय :  अखिलेश कुमार  बिहार राज्य के रहने वाले हैं अपनाघर में रहकर पढ़ाई कर रहें हैं | पढ़ाई में बहुत अच्छा करते हैं | इसके आलावा कवितायेँ लिखना और फूटबाल खेलना इन सभी में रूचि रखते हैं | 

रविवार, 21 जनवरी 2018

कविता : हवा चली

" हवा चली "

 हवा चली , हवा चली,
सर - सर  हवा चली | 
पत्ते गिराया धूल उड़ाया,
पानी में भी लहर उड़ाया | 
उस लहर से गांव डुबाया,
तब जाकर समझ में आया | 
लहर से बच्चो गांव बचाओ,
बचाकर नाम कमाओ | 
हवा चली , हवा चली ,
सर सर करती हवा चली |   

नाम : समीर कुमार , कक्षा : 7th , अपनाघर 

कवि परिचय : यह हैं समीर कुमार जो की कक्षा 7th के विद्यार्थी हैं और इलाहबाद के रहने वाले हैं | गाना गए लेते हैं |